फणीश्वर नाथ रेणु का उपन्यास 'मैला आँचल' हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आंचलिक उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास की भाषा और शिल्प अत्यंत सजीव और प्रामाणिक है, जो इसे विशेष बनाती है। रेणु ने इस उपन्यास में बिहार के ग्रामीण समाज की भाषा को बहुत ही सजीवता और सहजता से प्रस्तुत किया है।
'मैला आँचल' की भाषा बेहद सरल और प्रवाहपूर्ण है, जिसमें गांव की स्थानीय बोली, क्षेत्रीय मुहावरे, और लोकगीतों का व्यापक उपयोग किया गया है। इस प्रकार की भाषा न केवल पात्रों और उनकी बातचीत को प्रामाणिक बनाती है, बल्कि पाठकों को उस परिवेश और वातावरण का वास्तविक अनुभव भी कराती है। उदाहरण के रूप में, "तुम्हार नाम हौ बेटा?" "हमार नाम बिनेसर हउ" जैसे संवाद उपन्यास को जीवंत बनाते हैं।

रेणु का शिल्प भी अत्यंत संवेदनशील और विस्तारपूर्ण है। उन्होंने ग्रामीण जीवन के छोटे-छोटे पहलुओं, दृश्यों, और घटनाओं का बारीकी से वर्णन किया है। उनकी वर्णन शैली चित्रात्मक है, जिससे पाठक उनकी रचनाओं को महसूस कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, "बाजार की चौपाल पर चाचा लोग बैठे हुए हैं, चारों ओर गन्ने के रस की महक फैली हुई है" जैसे वर्णन पाठकों को वहां की जिंदगी का सजीव अनुभव कराते हैं।
उपन्यास में लोकगीतों और लोककथाओं का भी विशेष स्थान है। रेणु ने ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक धरोहर को संजोते हुए इनका सजीव चित्रण किया है। लोकगीत और कथाएं न केवल कहानी को जीवंत बनाती हैं, बल्कि समाज के भावनाओं और मान्यताओं को भी प्रकट करती हैं।
रेणु ने अपने पात्रों की भाषा उनके सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अनुरूप रखी है। प्रत्येक पात्र की भाषा और संवाद उसकी पहचान और व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं। इसके साथ ही, उपन्यास में प्रतीकात्मकता का भी प्रभावी उपयोग किया गया है। विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से ग्रामीण जीवन की जटिलताओं और संघर्षों को उभारने का प्रयास किया गया है।
कुल मिलाकर, 'मैला आँचल' की भाषा और शिल्प में फणीश्वर नाथ रेणु की अनूठी संवेदनशीलता और गहनता दिखाई देती है, जो इसे हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आंचलिक उपन्यासों में से एक बनाती है। इस उपन्यास के माध्यम से रेणु ने न केवल ग्रामीण जीवन की वास्तविकता को प्रस्तुत किया है, बल्कि पाठकों को उस दुनिया का अनुभव भी कराया है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
इसके अलावा, रेणु का शिल्प उपन्यास में विभिन्न बारीकियों को उभारता है। उनके द्वारा उपयोग किए गए प्रतीक और बिंब उपन्यास को और भी प्रभावशाली बनाते हैं। रेणु का ध्यान पाठकों को केवल कहानी सुनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे पाठकों को उस परिवेश, उन भावनाओं, और उन संघर्षों का हिस्सा बना देते हैं जिनसे उपन्यास के पात्र गुजरते हैं।
उदाहरण के लिए, "गांव की नदी की बहती धारा में एक अद्भुत सुकून है, जो किसी भी शहर के व्यस्ततम जीवन में मिलना मुश्किल है।" इस तरह के चित्रात्मक वर्णन पाठकों को कहानी में पूरी तरह से डूब जाने का अवसर प्रदान करते हैं और उन्हें महसूस कराते हैं कि वे भी उस गांव के जीवन का हिस्सा हैं।
रेणु की लेखन शैली ने 'मैला आँचल' को एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति बना दिया है, जो पाठकों को ग्रामीण भारत की असली तस्वीर देखने और महसूस करने का मौका देती है। उनकी गहन संवेदनशीलता और विस्तारपूर्ण शिल्प ने इस उपन्यास को हिंदी साहित्य में एक अमिट छाप छोड़ी है।