फणीश्वर नाथ रेणु का उपन्यास 'धरती धन न अपना' भारतीय ग्रामीण समाज की एक सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास गांव के जीवन के आंचलिक पहलुओं को बड़ी संवेदनशीलता और गहराई से उभारता है। रेणु ने इस उपन्यास में ग्रामीण परिवेश, स्थानीय भाषा और बोली, सामाजिक संरचना, लोकसंस्कृति और परंपराओं, आंचलिक राजनीति, आर्थिक स्थिति, और मानव संबंधों को बारीकी से चित्रित किया है।
रेणु ने ग्रामीण भारत के खेत-खलिहान, नदी-झरने, जंगल, और गांव के परिवेश का जीवंत चित्रण किया है, जिससे पाठक गांव की सुगंध और जीवन की वास्तविकता को महसूस कर सकते हैं। स्थानीय भाषा और बोली का प्रयोग उपन्यास में प्रामाणिकता जोड़ता है, जिससे पात्र और उनकी बातचीत और अधिक सजीव और वास्तविक लगती है। इसके साथ ही, उपन्यास में गांव की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का भी गहन विश्लेषण किया गया है।
उपन्यास में सामाजिक संरचना और जातिगत विभाजन को भी प्रमुखता से दर्शाया गया है। रेणु ने दिखाया है कि कैसे ग्रामीण समाज में विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच संबंध और संघर्ष विद्यमान हैं, और इनका जीवन पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। लोकसंस्कृति, परंपराएं, त्योहार, और धार्मिक अनुष्ठान गांव के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, और इन्हें उपन्यास में बेहद संवेदनशीलता से उभारा गया है।
ग्रामीण राजनीति और उसके प्रभावों का चित्रण भी उपन्यास के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। रेणु ने दिखाया है कि कैसे चुनाव और राजनीतिक षड्यंत्र ग्रामीण समाज की जटिलताओं को उजागर करते हैं। इसके अलावा, उपन्यास में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, और मजदूरी का भी विशद वर्णन है, जो किसानों की समस्याओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कठिनाइयों को उजागर करता है।
उपन्यास में मानव संबंधों और भावनाओं को भी गहराई से प्रस्तुत किया गया है। प्रेम, मित्रता, संघर्ष, और त्याग की कहानियां उपन्यास में प्रमुखता से मिलती हैं, जो गांव के जीवन की जटिलताओं को उभारती हैं। रेणु ने अपने पात्रों के माध्यम से दिखाया है कि कैसे इन भावनाओं का प्रभाव उनके जीवन पर पड़ता है और वे कैसे अपने संघर्षों का सामना करते हैं।
'धरती धन न अपना' केवल एक साहित्यिक कृति नहीं है, बल्कि यह भारतीय ग्रामीण जीवन का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह उपन्यास हमें भारतीय समाज की गहन समझ प्रदान करता है और हमें उन सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक समस्याओं से रूबरू कराता है जो ग्रामीण भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। रेणु का यह उपन्यास हमें सोचने पर मजबूर करता है और हमें समाज की उन छुपी हुई जटिलताओं को समझने में मदद करता है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।