निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए ।
सब गुरुजन को बुरो बतावै ।अपनी खिचड़ी अलग पकावै।भीतर तत्व न झूठी तेजी ।क्यों सखि सज्जन नहिं अंगरेजीतीन बुलाए तेरह आवैं।निज निज बिपता रोई सुनावैं ।आँखों फूटे भरा न पेट ।क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रेजुएट ।
यह पद्यांश प्रसिद्ध कवि "सुदर्शन" द्वारा लिखा गया है। इसमें कवि ने आधुनिक समाज में हो रहे बदलाव और लोगों की मानसिकता पर व्यंग्य किया है। उन्होंने बताया है कि किस तरह लोग अपने गुरुओं की आलोचना करते हैं और उनकी सलाह को महत्व नहीं देते। आजकल के लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाते हैं और समाज के हित की परवाह नहीं करते।
कवि ने बताया है कि इन लोगों में सच्चाई की कमी होती है और वे केवल दिखावे में रुचि रखते हैं। लोगों की सज्जनता का मापदंड अब अंग्रेजी भाषा का ज्ञान और ग्रेजुएट होना बन गया है। जब किसी को मदद के लिए बुलाया जाता है, तो लोग अपनी-अपनी समस्याएँ लेकर आ जाते हैं और दूसरों की समस्याओं की परवाह नहीं करते।
कवि का मानना है कि लोगों की इच्छाएँ इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि उनकी पूर्ति संभव नहीं है, चाहे उनके पास कितनी भी संपत्ति क्यों न हो। सच्ची सज्जनता और गुणों की जगह केवल बाहरी रूप-रंग और अंग्रेजी ज्ञान को महत्व दिया जा रहा है। लोगों की मानसिकता स्वार्थी और दिखावटी हो गई है और वे केवल अपनी समस्याओं की ही चर्चा करते हैं।
कुल मिलाकर, कवि ने इस पद्यांश में आधुनिक समाज की स्वार्थी और दिखावटी मानसिकता की आलोचना की है। उन्होंने बताया है कि लोगों के बीच सच्चाई, ईमानदारी और परस्पर सहयोग की कमी हो गई है। कवि ने आधुनिक समाज के लोगों को उनकी वास्तविकता का आईना दिखाने का प्रयास किया है और सज्जनता के सच्चे अर्थ को समझने की प्रेरणा दी है।